अमेरिका में हुए एक अध्ययन के दौरान इम्यूनोथेरेपी की नई दवा से रेक्टल कैंसर के सभी 18 मरीज पूरी तरह ठीक हो गए। छह महीने के कोर्स के बाद किसी भी मरीज की जांच में ट्यूमर सामने नहीं आया। कुछ मरीजों को दो साल का समय हो चुका है और अब तक कैंसर का कोई लक्षण नहीं उभरा है। न्यूयार्क स्थित एमएसके कैंसर सेंटर के डॉ. लुइस ए डियाज जूनियर के नेतृत्व में हुइ अध्ययन के नतीजे न्यू इंग्लैंड जर्नल आफ मेडिसिन में प्रकाशित किए गए हैं।
विज्ञानियों का कहना है कि भले ही 18 मरीजों पर किया गया यह अध्ययन छोटा है लेकिन इसके नतीजे बहुत उत्साहजनक है। भविष्य में इससे विभिन्न प्रकार के कैंस के सटीक इलाज की राह निकल सकती है। अध्ययन के दौरान सभी मरीजों को चेकप्वाइंट इनहिबिटर कही जाने वाली दवा डोस्टारलिमैब दी गई। छह महीने तक हर तीसरे हफ्ते एक खुराक दी गई। डोज पूरी होने के बाद जब जांच की गई तो किसी भी मरीज में कैंसर का लक्षण नहीं बचा था। अध्ययन से पहले यह माना जा रहा था कि शायद कुछ मरीजों को बाद में कीमोथेरेपी या अन्य दवा की जरूरत पड़े, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अध्ययन में शामिल किए गए सभी मरीजों का कैंसर शुरुआती स्टेज में था।
5 साल पहले एक परीक्षण से बंधी थी उम्मीद
2017 में फार्मा कंपनी मर्क ने डॉ. लुइस डियाज के नेतृत्व में ही अपनी चेकप्वाइंट इनहिबिटर दवा पेमब्रोलिजुमैब का परीक्षण किया था। उस दौरान ऐसे मरीजों को शामिल किया गया था जिनमे मेटास्टेटिक कैंसर था यानी कैंसर शरीर के कई अंगों में फेल चुका था। दो साल तक दवा लेने से करीब आधे मरीजों में ट्यूमर छोटा हो गया या उसका प्रसार रुक गया था। 10 फीसदी मरीजों में कैंसर पूरी तरह खत्म हो गया था। इसी नतीजे को देखकर डॉ. डियाज ने सोचा था कि यदि एक ही अंग में फैले कैंसर पर दवा का प्रयोग करें तो क्या नतीजा मिलेगा? इसी विचार के साथ इस बार उन्होंने फार्मा कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन के साथ मिलकर इस अध्ययन को अंजाम दिया।
दवा ऐसे काम करती है ः कैंसर कोशिकाएं स्वयं को शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ( इम्यून सिस्टम) से छिपाने में सक्षम होती है। उनकी इसी खूबी के कारण शरीर में ट्यूमर बनता है। यह दवा कैंसर की कोशिकाओं से उस पर्दे को हटा देती है और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें आसानी से देख पाती है। इसके बाद हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली ही उन कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर देती है। इसिलिए इस प्रक्रिया को इम्यूनोथेरेपी कहा जाता है।
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